गुरु पूर्णिमा पूजा
अपने गुरुओं को धन्यवाद: व्यास का नाम और मन से दिया उपहार
सामान्य विधि — अधिकांश घर
गुरु पूर्णिमा, आषाढ़ पूर्णिमा, सुबह। मुहूर्त ऐप के त्योहार कार्ड पर दिन दिखता है।
लगभग 20 मिनट, साथ में भेंट या फ़ोन
यह दिन व्यास और उनके बाद के हर गुरु का सम्मान है: आध्यात्मिक मार्गदर्शक, माता-पिता, शिक्षक, जिसने भी कुछ स्थायी सिखाया। पूजा सरल है, और इसका सार है अपने गुरु के पास जाकर धन्यवाद कहना। कोई मंत्र कठिन लगे तो उसकी जगह "ॐ गुरवे नमः" कह सकते हैं।
इस पूजा की प्रार्थनाएँ
Shubham Karoti ›Vakratunda Mahakaya ›Shuklambaradharam ›Mushikavahana ›Guru Brahma ›
तैयारी
एक दिन पहले
- सोचें किसे धन्यवाद देना है, और भेंट, फ़ोन या पत्र की योजना बनाएँ।
- फूल और फल लें, और चाहें तो छोटा उपहार।
सुबह
- स्नान कर गुरु का चित्र, उनकी दी पुस्तक, या व्यास का चित्र रखें।
- पूजा की थाली तैयार रखें।
आपको क्या चाहिए
गुरु के लिए
- 1गुरु या व्यास का चित्र, या शिक्षक की दी पुस्तक
- 1फूल या माला
- 1 थालीफल और मिठाई
- इच्छानुसारछोटा उपहार या दक्षिणा
- 1धन्यवाद का पत्र या नोटवैकल्पिक, और प्रायः सबसे मूल्यवान।
- 1जो पुस्तक पढ़ रहे हों
पूजा स्थान के लिए
- 1उसे रखने के लिए साफ़ कपड़ालाल या पीला परंपरागत है।
- 1पूजा की थाली
थाली में
- 1रुई की बाती वाला दीयाघी या तिल का तेल।
- 2अगरबत्ती
- एक-एक चुटकीकुमकुम और हल्दी
- थोड़ाचंदनचंदन न हो तो कुमकुम लें।
- 1 बड़ा चम्मचअक्षत — थोड़े कुमकुम में मिले साबुत चावल
- एक मुट्ठीताज़े फूल
- 1चम्मच के साथ स्वच्छ जल का छोटा पात्र
- 1छोटी घंटीवैकल्पिक।
अर्पण के लिए
- थोड़ाफल, गुड़, मिश्री या घर में ताज़ा बना कुछ भी
- 1 या 2 टुकड़ेआरती के लिए कपूरवैकल्पिक; इसकी जगह दीया लिया जा सकता है।
पूजा
शांत होकर बैठें
आसन या मुड़े कपड़े पर पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके देवता के सामने बैठें। थाली अपने दाहिनी ओर रखें। एक गहरी साँस लें और कुछ मिनट के लिए दिन को रुकने दें।
दीया जलाएँ
दीया जलाकर देवता के दाहिनी ओर रखें और उसे हाथ जोड़ें।
शुभं करोति कल्याणमारोग्यं धनसम्पदः। शत्रुबुद्धिविनाशाय दीपज्योतिर्नमोऽस्तु ते॥शुभ, कल्याण, आरोग्य और धन-संपदा देने वाली तथा दुर्बुद्धि का नाश करने वाली दीपज्योति को नमस्कार।गणेश जी का स्मरण
हर पूजा विघ्नहर्ता गणेश जी से शुरू होती है। हाथ जोड़कर यह श्लोक एक बार बोलें।
वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटिसमप्रभ। निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥हे वक्रतुंड, विशालकाय, करोड़ों सूर्यों के समान तेजस्वी गणेश, मेरे सभी कार्य सदा निर्विघ्न करें।संकल्प — अपना उद्देश्य कहें
दाहिनी हथेली में थोड़ा जल, अक्षत और एक फूल लें। अपना नाम, हिंदू पंचांग की आज की तिथि और पूजा का उद्देश्य कहें — जैसे परिवार की कुशलता के लिए। फिर जल को भूमि पर या थाली में छोड़ दें। आज का पूरा संकल्प पढ़ने के लिए "संकल्प करें" दबाएँ।
पुष्प — फूल
फूल देवता के चरणों में एक-एक या कुछ एक साथ अर्पित करें।
ॐ गुरवे नमः। पुष्पाणि समर्पयामि॥गुरुर्ब्रह्मा — गुरु को प्रणाम
चित्र या पुस्तक के सामने हाथ जोड़कर यह श्लोक कहें।
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः। गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः॥गुरु ब्रह्मा हैं, गुरु विष्णु हैं, गुरु महेश्वर हैं; गुरु ही साक्षात् परब्रह्म हैं: उन गुरु को नमस्कार।गुरुओं को याद करें
शांत बैठकर हर उस व्यक्ति का नाम लें जिसने कुछ स्थायी सिखाया। हर एक के लिए एक फूल अर्पित करें।
पढ़ें
गुरु को प्रिय किसी ग्रंथ या पुस्तक का एक पृष्ठ पढ़ें। परंपरा में अध्ययन गुरु को सबसे अच्छा धन्यवाद है।
दीप
दीया उठाकर देवता को दिखाएँ और घड़ी की दिशा में तीन बार घुमाएँ।
ॐ गुरवे नमः। दीपं दर्शयामि॥नैवेद्य — भोग
भोग देवता के सामने रखें। उसके चारों ओर थोड़ा जल छिड़कें और हाथ जोड़कर अर्पित करें। एक क्षण रुकें, मानो उसे स्वीकार किया जा रहा हो।
ॐ गुरवे नमः। नैवेद्यं निवेदयामि॥क्षमा प्रार्थना
हाथ जोड़कर, जो भी गलत हुआ या छूट गया उसके लिए क्षमा माँगें। हर पूजा इसी से पूर्ण होती है।
आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम्। पूजां चैव न जानामि क्षमस्व परमेश्वर॥ मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वर। यत्पूजितं मया देव परिपूर्णं तदस्तु मे॥मैं न आवाहन जानता हूँ, न विसर्जन, न ही पूजा करना; हे परमेश्वर, मुझे क्षमा करें। मंत्र, क्रिया या भक्ति से हीन जो भी पूजा मैंने की, वह पूर्ण हो।जाकर धन्यवाद दें
हो सके तो गुरु के पास जाकर चरण छुएँ, या दोनों हाथों से उपहार दें। दूर हों तो फ़ोन करें या लिखें। न रहे हों तो किसी छोटे को बताएँ कि उन्होंने क्या सिखाया।
उपवास
व्रत आवश्यक नहीं। कुछ लोग पूजा तक रखते हैं।
करना अच्छा है
- ठीक-ठीक बताएँ कि उन्होंने क्या सिखाया।
- आज किसी छोटे को कुछ सिखाएँ।
परंपरा टालती है
- उपहार को धन का दिखावा न बनाएँ।
- दिन को केवल धार्मिक गुरुओं तक सीमित न रखें; जिसने भी सिखाया वह गुरु है।
गुरु का असली उपहार आगे बढ़ता है। दिया गया धन्यवाद और आगे सिखाया पाठ इस दिन को पूरा करते हैं।
परंपराएँ अलग-अलग होती हैं। अपने परिवार की रीति का पालन करें।